रेफरल रोकने में भारत असफल

Publicado  बुधवार, दिसंबर 08, 2010

प्रशांत रायचौधरी
आईसीसी सूत्रों ने संकेत दिया है कि आगामी वर्ल्ड कप क्रिकेट प्रतियोगिता के सात मैचों में रेफरल सिस्टम लागू किया जाएगा। इस निर्णय से बीसीसीआई अलग-थलग पड़ गया है क्योंकि बाकी संबध्द देशों ने रेफरल के लिए पहले ही हरी झंडी दे दी है। रेफरल का उपयोग वर्ल्ड कप में चारों वर्ल्ड कप क्वार्टर फाइनल मैचों, दो सेमीफाइनलों व फाइनल में किया जाएगा।

आईसीसी की कहना है कि यदि तकनीकी साधन पूरे होते तो पूरे टूर्नामेंट में इसका उपयोग होता। बहरहाल, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर, महेंद्र सिंह धोनी आदि भारतीय सितारों को रेफरल के मामले में जबर्दस्त शिकस्त मिली।

क्यों करते हैं सचिन विरोध :

मास्टर ब्लास्टर का मानना है कि अभी रेफरल के मामले में उन्नत तकनीक उपलब्ध नहीं है इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। वैसे रेफ़रल सिस्टम से तकनीक को लेकर कई भ्रांतियाँ हैं लेकिन यह चकित करने के लिए काफी है कि भारत ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट सीरीज के लिए भी रेफरल के उपयोग में असहमति जताई है।

एलबीडब्ल्यू का जारी है विवाद : 

मैदानी अंपायरों को वैसे तो अक्सर एलबीडब्ल्यू आउट होने के मामले में विवादों का सामना करना पड़ता है। उनके सारे निर्णय सही नहीं होते हैं। स्टीव बकनर व पाकिस्तान के अलीम दर पर खिलाड़ी कभी भरोसा नहीं करते रहे हैं। ऐसे में  एलबीडब्ल्यू की अपील के मामले में गेंद जब बल्लेबाज के पैड पर लगती है तो उसकी ऊँचाई और लाइन को मापने के लिए जिस ट्रैकिंग सिस्टम का प्रयोग किया जाता है  वह भरोसे के लायक नहीं है। उसमें अभी भी तकनीकी खामियां है। वह अभी भी मशीनी बकनर है।

कुछ लोगों का यह मानना है कि यादा मशीनी होने से खेल का प्रभाव प्रभावित होता है। सचिन का मानना है मैदानी अंपायरों से यदाकदा ही गलती होती है इसलिए रेफरल के उपयोग की आवश्यकता नहीं है। ज्ञातव्य है कि सचिन तब से नाराज हैं जब श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज में रेफरल सही फैसला नहीं कर सका था। 

भारत पड़ गया अलग-थलग :

रेफरल के मामले में सभी टेस्ट खेलने वाले देशों ने आईसीसी का साथ दिया है लेकिन भारत अभी भी उसका विरोध कर रहा है। भारत को आईसीसी का सबसे धनवान राष्ट्र माना जाता है लेकिन इस मामले में उसका धनतंत्र कोई साथ नहीं दे सका है। अन्य देशों का तर्क इस मामले में यह है कि भले ही यह त्रुटिरहित सिस्टम नहीं है लेकिन अंपायरों की गलती को कम करने के लिए बढ़िया मशीनी अंपायर है। देखा जाए तो भारत को अंपायर डिसीजन रेफरल सिस्टम को स्वीकार कर लेना चाहिए जैसा कि अन्य देशों ने किया है। धारा के विपरीत जाने के बीसीसीआई के निर्णय से कोई फ़ायदा नहीं है।

पदकों की दौड़ में पिछड़ गया एथलेटिक्स

Publicado  गुरुवार, अक्टूबर 21, 2010


प्रशांत रायचौधरी

ओलिंपिक, एशियाड व कॉमनवेल्थ गेम्स में सबसे ज्यादा आकर्षण एथलेटिक्स का होता है लेकिन भारत एथलेटिक्स में झंडे गाड़ने में असफल ही है । नई दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में भी भारत एथलेटिक्स में कोई कमाल नहीं कर सका है जबकि गेम्स में अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, रशिया व कोरिया जैसी सशक्त टीमें भाग नहीं लेती हैं। अब जबकि भारत में खेलों में पैसा बरसने लगा है, स्पांसरों की कोई कमी नहीं है, ढेरों अकादमी खुल रहे हैं फिर भी यूसैन बोल्‍ट एथलेटिक्स में पीछे रहना आश्चर्यजनक है ।भारत में yयूसैन बोल्ट तो दूर की बात है, टाइसन ग्रे,ए.पॉवेल या नई दिल्ली 100 मीटर दौड़ के विजेता जमैका के लोरेन क्लार्क के समकक्ष पहुंचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

तीन प्रमुख खेलों में भारत की विभिन्न खेलों में पदकों की दौड़
बीजिंग ओलिंपिक (2008)

1 स्वर्ण, 2 कांस्य : कुल 3 पदक
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दोहा एशियन गेम्स (2006)
9 स्वर्ण, 18 रजत,24 कांस्य : कुल : 51 पदक
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दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स (2006)
22 स्वर्ण, 17 रजत, 11 कांस्य पदक : कुल 50 पदक

बीते कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने 50 पदक और एशियन गेम्स में 51 पदक जीते थे लेकिन बीजिंग ओलिंपिक में उसे सिर्फ 3 ही पदक मिले। अमेरिका, चीन, जापान,रशिया व जर्मनी जैसी सशक्त टीमों की अनुपस्थिति में भारत कॉमनवेल्थ में पदकों का अर्धशतक तो लगाने में सफल होता है लेकिन ओलिंपिक में वह उपलब्धि कहां गायब हो जाती है। सच तो यह है यदि विश्व स्तर पर देखा जाए तो भारत अभी काफी पीछे है। ओलिंपिक में जहां चीन व अमेरिका पदकों का शतक लगाते हैं वहीं भारत का प्रदर्शन शर्मनाक ही रहता है। पिछले ओलिंपिक में यदि अभिनव बिंद्रा को शूटिंग में स्वर्ण नहीं मिलता तो व्यक्तिगत स्वर्ण सूखा ही रह जाता।
एथलेटिक्स में पीछे है भारत :
खेलों की दुनिया में भारतीय एथलीटों को अभी भी वह सम्मान नहीं प्राप्त है जो किसी समय उड़न सिख मिल्खा सिंह व उड़न परी पीटी ऊषा को प्राप्त था। जमैका जैसे छोटे देश ने यूसैन बोल्ट के माध्यम से जो गौरव प्राप्त किया है वह अतुलनीय है। वैसे हमने शूटिंग, बॉक्सिंग, बैडमिंटन, तीरंदाजी, टेबल-टेनिस व टेनिस में विश्व ख्याति पाई है लेकिन आउटडोर गेम्स में एथलेटिक्स में हम फिसड्डी साबित हो रहे हैं ।
क्या है कमी : देखा जाए तो भारत में शासकीय स्तर पर प्रयास काफी हो रहे हैं लेकिन फिर भी नतीजा संतोषजनक नहीं है। एथलीटों को इंफ्रास्ट्रक्चर व अकादमी की सुविधा जॉब च्यारंटी आदि सभी सुविधाएं दी जा रही है लेकिन एक भी बोल्ट पैदा नहीं हो पा रहा है। पीटी ऊषा जैसी कई एथलीटो ने निजी अकादमी भी स्थापित की है लेकिन अभी नतीजे आने प्रारंभ नहीं हुए हैं। पिछले दो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को एथलेटिक्स में सिर्फ 5 ही पदक मिले। क्या यह उदाहरण भारत के दर्दे हाल जानने के लिए काफी नहीं है।

जमैका का कमाल
नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में जमैका के लेरोन क्लार्क ने 10.12 सेकंड में 100 मीटर की दौड़ जीत ली जबकि भारत के अब्दुल नजीर कुरैशी फाइनल के लिए क्वालीफाई ही नहीं कर सके। जमैका जैसे छोटे देश का एथलेटिक्स में कमाल रिसर्च का विषय है। पिछले एक दशक से एथलेटिक्स में इसका दबदबा बढ़ा है। जमैका के यूसैन बोल्ट ने 100 मीटर व 200 मीटर की दौड़ 9.69 सेकंड व 19.30 से. के समय में तय कर नया विश्व व ओलिंपिक कीर्तिमान रचा है। इस रफ्तार के सौदागर ने जो कमाल किया है उसे दोहराने में अन्यों को काफी समय लग जाएगा।
क्यों आगे है जमैका
1. वहां स्कूली स्तर पर बच्चों को एथलेटिक्स के लिए प्रेरित किया जाता है।
2. अंडर-19 स्तर की एथलेटिक्स स्पर्धा में दर्शकों की संख्या 20 से 25 हजार की होती है जिससे साबित होता है कि वहां एथलेटिक्स की जड़ कितनी मजबूत है।
3. एथलीटों को विश्व स्तरीय बनाने के लिए वहां हाई परफॉमेंस ट्रेनिंग सेंटर स्थापित किए गए हैं जिसमें विश्व प्रसिद्ध कोच प्रशिक्षण देते हैं।
4. एथलीटों की गति व शक्ति बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक ढंग से प्रशिक्षण दिया जाता है।
5. एथलेटिक्स कोच स्टीफन फ्रांसिस के क्लब में 70 से ज्यादा एथलीट उच्च प्रशिक्षण ले रहे हैं।
प्युमा का है सहयोग : जमैका में एथलीटों को गढ़ने में प्युमा ने काफी रूचि ली है। यूसैन बोल्ट इसके उदाहरण है। बोल्ट को प्युमा ने आर्थिक मामलों में तनाव रहित रखा जिससे विश्वस्तरीय बनने में उन्हें मदद मिली।
जहां चाह है वहां राह है
जमैका में जब स्टीफन फ्रांसिस व फॉस्टर ने एथलेटिक्स क्लब की स्थापना की थी तब उनकी आर्थिक मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आया। इन्होंने इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और फॉस्टर ने अपनी कार बेच दी और क्लब की आवश्यकताएं जुटाईं। प्युमा तो बहुत बाद में बोल्ट से जुड़ा।
अमेरिका का भी है योगदान :
जमैका की नई पीढ़ी अमेरिका में पढ़ते हुए वहां एथलेटिक्स का प्रशिक्षण लेना पसंद करते हैं। इसकी वजह यह है कि वहां खेल के साथ पढ़ाई की सुविधा भी मिल जाती है। प्रशिक्षण भी आधुनिक ढंग से मिल जाता है। जमैका के 25 से ज्यादा एथलेटिक्स के कोच अमेरिकी यूनिवर्सिटी में कोचिंग दे रहे हैं तथा सैकड़ों जमैकन एथलीट उन यूनिवर्सिटीज में अध्ययनरत हैं।

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ओलिंपिक, कॉमनवेल्थ और हम
इवेंट-ओलिंपिक-कॉमनवेल्थ-भारत

100 मीटर-9.69 से.-9.88 से.-10.30 से.
200मीटर-19.30 से.-19.97 से.-20.73 से.
400 मीटर- 43.49 से.-44.52 से.-45.48 से.
800 मीटर - 1:42.58 से.-1: 43.22 से.-1:45.77 से.
1500 मीटर- 3:32.07 से.-3:32.16से.-3:38.00 से.


100 मीटर दौड़ में विश्व के टॉप-10 एथलीट
1. यूसैन बोल्ट -जमैका-9.58 सेकंड(2009)
2.टायसन गे-अमेरिका-9.69 सेकंड (2009)
3.असाफा पावेल-जमैका-9.72 से. (2008)
4.नेस्टा कार्टर -जमैका-9.78 से. (2010)
5.मॉरिस ग्रीन -अमेरिका-9.79 से. (1999)
5.डोनोवान बैली -कनाडा-9.79 से.(1996)
6.ब्रनी सुरीन-कनाडा-9.84 से. (1999)
6.लिरॉय बेरेल-अमेरिका-9.84 से. (1994)
7.जस्टिन गेटिन-अमेरिका-9.85 से. (2004)
7.ओलुसोजी फसुवा -नाइजीरिया- 9.85 से. (2006)
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पांच प्रमुख इवेंट में ओलिंपिक रिकॉर्ड
100 मीटर -यूसैन बोल्ट -जमैका-9.69 से. (2008 बीजिंग ओलिंपिक)
200 मीटर-यूसैन बोल्ट-जमैका-19.30 से. (2008 बीजिंग ओलिंपिक)
400मीटर-माइकल जॉनसन-अमेरिका-43.49 से. (1996,अटलांटा ओ.)
800 मीटर-वी. रोडल-नॉर्वे-1:42.58 से. (1996,अटलांटा ओ.)
1500 मीटर - नोआ नेनी-केन्या-3:32.07 से. (2000,सिडनी ओ.)
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पांच प्रमुख इवेंट में भारतीय रिकॉर्ड
100 मीटर दौड़ : अनिल कुमार - 10.30 से.(2005)
200 मीटर दौड़ - अनिल कुमार-20.73 से.(2000)
400 मीटर दौड़-के.एम.बीनु-45.48 से.(2004)
800 मीटर दौड़-श्रीराम सिंह-1:45.77 (1976)
1500 मीटर दौड़- बहादुर प्रसाद- 3:38.00 (1995)
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पांच प्रमुख इवेंट में कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड
100 मीटर : ए.बोल्डन -.त्रिनिदाद 9.88 से.-(1998)
200 मीटर-फ्रेंकी फ्रेडरिक नामीबिया-19.97 से. (1994)
400 मीटर- इवान थॉमस -वेल्स- 44.52 से.
800 मीटर- स्टीव क्रेम-इंज्लैंड- 1:43.22
1500 मीटर-फिलबर्ट (तंजानिया)-3:32.16
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इनका कहना है
हमारे समय में एथलेटिक्स में सुविधाओं की कमी थी लेकिन जोश, जज्बा व जुनून बरकरार था। फौजी होने के नाते विरोधी को हराने की भी धुन बनी रहती थी। यही कारण है कि किसी वैज्ञानिक प्रशिक्षण के बिना भी मैं विश्व प्रसिद्ध धावक बन सका। मैं यह नहीं कहूंगा कि बदलते समय में बीता उदाहरण प्रेरक हो सकता है लेकिन यह जरूर कहूंगा कि अब आधुनिक सुविधाएं व रोजगार की गारंटी है जिसका एथलीट पूरा-पूरा लाभ उठाएं। - मिल्खा सिंह, उड़न सिख--------------------------------------------------
भारत में एथलेटिक्स की सुविधाएं तो हैं लेकिन खेलों में छाई राजनीति के कारण तरक्की नहीं हो पा रही है। राज्य संगठनों में ऐसे लोग विराजमान है जिनका खेलों से कोई वास्ता नहीं रहा है। मैंने अपनी अकादमी प्रारंभ की है और बहुत जल्दी विश्व स्तरीय एथलीट वहां से निकलेंगे ऐसा मैं कह सकती हूं। - पीटी ऊषा, उड़न परी

क्रिकेट की नई शक्ति : इंग्लैंड

Publicado  शुक्रवार, मई 21, 2010


प्रशांत रायचौधरी
दक्षिण अफ्रीका में खेले गए पहले टी20 विश्व कप में जिस टीम के स्टुअर्ट ब्रॉड की गेंद पर भारत के युवराज सिंह ने छह गेंदों में छह छक्के जड़े थे वह टीम पहले व दूसरे टी20 विश्व कप में तो कोई करिश्मा नहीं कर सकी लेकिन अब वही टीम ब्रिजटाउन में ऑस्ट्रेलिया जैसी खिताब की प्रबल दावेदार टीम को सात विकेट से हरा कर विश्व सिरमौर बन चुकी है। गत वर्ष टी20 विश्व कप प्रतियोगिता के लीग के अपने पहले मैच में हॉलैंड जैसी कमजोर टीम के खिलाफ हारने वाली इंग्लैंड टीम इस साल टी20 की विश्व कप विजेता टीम बन चुकी है। गत वर्ष टी20 में इंग्लैंड ने आठ अंतर्राष्ट्रीय मैच खेले थे जिसमें से उसे पांच मैचों में पराजय मिली थी। आखिर क्या कारण है कि साल भर में इस टीम ने चमत्कार कर दिया। जिस टीम को प्रतियोगिता के पहले संभावित विजेता नहीं माना जा रहा था वह अब नए फॉर्मेट का बादशाह बन चुका है। 35 सालों में इंग्लैंड ने आईसीसी की यह पहली प्रतियोगिता जीती है अन्यथा बीते 35 सालों में वह 19 टूर्नामेंटों में जीत से वंचित रहा है।
क्या कारण है जीत के : इंग्लैंड की जीत के कई कारण है जिनमें प्रमुख है टीम में जोशिले खिलाडिय़ों को प्राथमिकता, बढ़िया क्षेत्ररक्षण,स्ट्राइक रेट को गतिशील रखना, पावर प्ले में उम्दा प्रदर्शन, छक्के मारने की क्षमता में वृद्धि, गेंदबाजी में विविधता व टीम वर्क। इन सबके लिए कोच एंडी फ्लॉवर व कप्तान पॉल कालिंगवुड ने प्रशंसनीय पहल की है। इन्हें अनुभवी खिलाड़ी केविन पीटरसन का भी बढिय़ा सहयोग मिला है।
ओपनिंग जोड़ी लाजवाब: इंग्लैंड की ओपनिंग जोड़ी कीसवेटर और माइकल लंब ने आपसी समझबूझ व तालमेल से रन जुटा कर पारी को ठोस आधार दिया। कीसवेटर प्राय: सभी मैचों में छाए। वे यदि बल्ले से नहीं चले तो कीपिंग में बढिय़ा प्रदर्शन किया।
गेंदबाजों ने किया कमाल : इंग्लैंड के तेज गेंदबाजों साइडबॉटम, ब्रेसनन व स्पिनर स्वान व यार्डी ने उम्दा प्रदर्शन किया। बाएं हाथ के व लंबे बालों वाले तेज गेंदबाज साइडबॉटम ने गति, स्विंग व यॉर्कर में चतुराई दिखाई वहीं ब्रेसनन ने टीम को बढिय़ा स्टार्ट दिया। तीसरे तेज गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड ने भी समय-समय पर विपक्षी बल्लेबाजों के लिए परेशानी पैदा की। स्पिनर द्वय स्वान व यार्डी ने न केवल कसावट भरी गेंदबाजी की बल्कि विकेट भी चटकाए। इंग्लैंड के गेंदबाजी आक्रमण टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है। स्पिनर स्वान को स्पर्धा का सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने न केवल 10 विकेट लिए बल्कि उनका इकॉनॉमी रेट भी 6.5 रहा।
पीटरसन छाए : प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट केविन पीटरसन ने शानदार बल्लेबाजी की। उन्होंने टीम की जीत में कई उपयोगी पारियां खेलीं। उन्होंने टूर्नामेंट में कुल 248 रन बनाए। पीटरसन इसका श्रेय आईपीएल को देना चाहते हैं जबकि भारतीय खिलाडि़यों ने अपनी असफलता का दोष आईपीएल के मथ्थे मढ़ दिया।
छक्का मारने में माहिर : इंग्लैंड के प्रमुख बल्लेबाजों का स्ट्राइक रेट 100 से उपर रहा। ये बल्लेबाज स्पिनर हो या तेज गेंदबाज दोनों को समान रूप से छक्का जडऩे में माहिर हैं। इंग्लैंड के पीटरसन के अलावा कीसवेटर, लंब, ल्यूक राइट, कॉलिंगवुड व ई.मोर्गन छोटे फॉर्मेट में छक्के लगाने में माहिर हैं। इंग्लैंड के अलावा किसी और टीम में इसप्रकार की क्षमता नहीं दिखी।
काउंटी का अनुभव काम आया: इंग्लैंड टीम को टी20 काउंटी टूर्नामेंट का अनुभव काफी काम आया। इस ब्रितानी टीम ने टी20 को एक नई दिशा दी है।

धोनी ब्रिगेड का टूट गया सपना

Publicado  गुरुवार, मई 13, 2010

प्रशांत रायचौधरी
कैरेबियाई धरती पर जारी टी20 वर्ल्ड कप क्रिकेट प्रतियोगिता से अंतत: भारतीय टीम बाहर हो गई। सुपर-8 के तीसरे व उसके अंतिम मैच में उसे श्रीलंका ने पांच विकेट से पराजित किया। सुपर-8 में इसके पहले ऑस्ट्रेलिया ने उसे 49 रन से व वेस्टइंडीज ने 14 रन से हराया था। श्रीलंका ने अंतिम आठ गेंदों में 4 छक्के लगाकर भारतीय टीम के छक्के छुड़ा दिए।

देखा जाए तो भारत से इस बार खराब प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी। आईपीएल में भारतीय सितारे जबर्दस्त फॉर्म में थे और सहवाग व धोनी सहित कई सीनियर साथियों ने कहा था कि आईपीएल से थकावट नहीं होती बल्कि बढिय़ा अभ्यास हो जाता है जबकि धोनी ने श्रीलंका से हार के बाद कहा कि आईपीएल की नाइट पार्टियों व एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के कारण आवश्यक फिटनेस बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।

क्या कप्तानी में है कमी :

सौरव गांगुली के बाद भारत के सबसे सफल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी चूकते से नजर आ रहे है। हो सकता है कि उन्हें आगामी वल्र्ड कप तक आजमाया जाए फिर सुरेश रैना की ताजपोशी हो जाए। रैना को जिम्बाब्वे दौरे के लिए कप्तान बनाए जाने से यही संकेत मिलता है। खैर, धोनी कहते हैं कि हमारे बल्लेबाज शॉर्ट पिच गेंदों को नहीं खेल पाते हैं।

हांलाकि वे यह भी जानते होंगे कि यह कमजोरी पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से है। फिर इस कमी को एक्पोज करने की आवश्यकता क्या है। इस कमी को दूर करने के लिए द.अफ्रीकी कोच गैरी कर्स्टन ने क्या कोई उपाय नहीं किया है। यदि नहीं तो टीम इंडिया अजेय योद्धा बनने का सपना कैसे देख रही है।

आईपीएल ही जिम्मेदार :

सच कहा जाए तो आईपीएल बहुत लंबा चलता है। छोटे फॉर्मेट के क्रिकेट में फिटनेस मायने रखती है। अत: खिलाड़ी पर शारीरिक जोर ज्यादा पड़ता है। ऐसे में वे सौ प्रतिशत कैसे दे सकते हैं। उदाहरण के लिए यूसुफ पठान आईपीएल के हीरो थे लेकिन टी20 वर्ल्ड कप में उनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। वे एक भी मैच में मैच विजेता प्रदर्शन नहीं कर सके।

नए सितारों से धोनी खुश नहीं :

कप्तान धोनी का कहना है कि नए सितारों में अनुभव की कमी तथा शॉर्ट पिच गेंदों को खेलने की तकनीक की कमी है। सीनियर खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग, राहुल द्रविड़, सचिन तेंडुलकर, सौरव गांगुली आदि जिस खूबी से स्पिन व तेज गेंदों को खेलते हैं वैसी तकनीक नए खिलाडिय़ों में देखने को नहीं मिल रही है। ये खिलाड़ी वेस्टइंडीज में शॉर्ट पिच गेंदों के सामने पूरी तरह से एक्सपोज हो गए और असहाय नजर आए। इसी तरह चूंकि यहां सहवाग भी नहीं थे तो गंभीर भी विकेट पर पूरे भरोसे के साथ नहीं खेल पा रहे थे। यहां तक सहवाग की गैरमौजूदगी में गौतम गंभीर भी साधारण नजर आए।

जडेजा ने किया निराश :

भारतीय टीम से रवींद्र जडेजा ने सबसे ज्यादा निराश किया। उनके गेंदों पर आधा दर्जन से अधिक छक्के लगे। रवींद्र जडेजा पर मैच दर मैच इतना अधिक भरोसा क्यों किया गया । यह भी कह सकते हैं कि उनके चयन का आधार क्या था। वे आईपीएल से दूर थे जबकि रनों का अंबार लगाने के बावजूद रॉबिन उथप्पा, विराट कोहली, सौरभ तिवारी और मनीष पांडे जैसे खिलाडिय़ों को टीम इंडिया में आने के लिए और कौन सा तरीका अपनाना होगा।

सपोर्ट स्टाफ को हटाए :

आज जमाना प्रोफेशनल्स का है। हर जगह रणनीति के तहत काम किया जाता है। टीम इंडिया ने या तो टी 20 विश्वकप जैसे बड़े टूर्नामेंट में विरोधी टीमों के लिए कोई रणनीति ही नहीं बनाई, और अगर बनाई भी थी, तो कह सकते हैं कि वो पूरी तरह से फ्लॉप हो गई। अब ये रणनीति अगर फ्लॉप रही तो इसका पोस्टमार्टम होना भी जरुरी है। टीम के साथ सपोर्ट स्टाफ में बहुत महंगे कोच और ट्रेनर होने के बावजूद अगर टीम इतनी लचर फील्डिंग करती है तो बेहतर है या तो सपोर्ट स्टाफ को बाहर कर दिया जाए या फिर वो युवा टीम चुनी जाए जो कोच और ट्रेनर के सिखाए रास्ते पर चल सके।

अब क्या करेंगे सितारे :

भारतीय टीम को इसी माह त्रिकोणीय सीरीज खेलने जिम्बाब्वे जाना है। घोषित टीम में सीनियर खिलाडिय़ों धोनी, जहीर, गंभीर, हरभजन सिंह आदि को आराम दिया गया है अत: इन्हें पूरी तरह आराम फरमाना चाहिए और बाद में तरोताजा होने के बाद आगामी 50-50 वर्ल्ड कप क्रिकेट की तैयारियों में व्यस्त हो जाना चाहिए। एक वर्ल्ड कप फिसल गया लेकिन दूसरे को कैच करने का प्रयास जारी रहे तो अच्छा होगा।

दिलों में बसने लगे हैं सुरेश रैना

Publicado  गुरुवार, मई 06, 2010


प्रशांत रायचौधरी
गाजियाबाद जैसे छोटे शहर के सुरेश रैना बड़े खिलाड़ी बन चुके हैैं। उन्होंने पिछले दिनों आईपीएल-3 में और वेस्टइंडीज द्वीप समूह में जारी टी20 वल्र्ड कप क्रिकेट प्रतियोगिता में शानदार शतक जड़कर क्रिकेट विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षिक किया है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान वसीम अकरम ने उन्हें विश्व के सर्वश्रेष्ठ युवा बल्लेबाज की संज्ञा दी है। बाएं हाथ के इस 23 वर्षीय बल्लेबाज ने तारीफों का जवाब यह कह कर दिया कि चेन्नई सुपर किंग्स की ओर से खेलते समय स्टीफन फ्लेमिंग, महेंद्र सिंह धोनी और मैथ्यू हेडन ने जो मार्गदर्शन दिया उसीका यह परिणाम है। तात्पर्य यह है कि रैना अपने वरिष्ठों के सुझावों को गंभीरता से लेते हैैं और क्रिकेट की दुनिया में लंबे रेस का खिलाड़ी बनना चाहते हैैं। रैना की बल्लेबाजी में युवराज सिंह की झलक लगती है। यह और बात है कि वे इन दिनों युवी से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैैं। टी20 वल्र्ड कप में उन्होंने खिताब की दावेदार टीमों में से एक दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पहले 50 रन 42 गेंदों (4 चौके,1छक्का) पर बनाए लेकिन अगले 51 रन उन्होंने सिर्फ 18 गेंदों में 5 चौकों व 4 छक्कों के सहारे जुटा लिए। उनकी आक्रमकता का इससे बढिय़ा उदाहरण क्या हो सकता है। रैना ने ए.मोर्केल की गेंद पर छक्का मार कर अपना शतक पूरा करने का साहस दिखाया। यह खुशी की बात है कि उन्होंने जब शतक लगाया तब उनके आदर्श महेंद्र सिंह धोनी दूसरी छोर पर थे। रैना जिस तरह से खेल रहे हैैं उससे यह लगता है कि भारत को तीसरे क्रम का खिलाड़ी मिल गया है। रैना वनडे व टी20 में अपनी उपयोगिता साबित कर चुके हैैं लेकिन उन्हें अभी टेस्ट में स्वयं को स्थापित करना है। वसीम अकरम का कहना है कि जब तक रैना टेस्ट में कमाल नहीं करते हैैं तब तक सौरव गांगुली से उनकी तुलना नहीं करना चाहिए।
ऐसे बढ़ा रैना का कारवां : एक प्रोफेशनल क्रिकेटर बनने के लिए रैना ने 1999 में शासकीय स्पोट्र्स कॉलेज लखनऊ में दाखिला लिया। वे जल्दी ही चयनकर्ताओं के निगाह में आ गए और जब सिर्फ साढ़े 15 साल के थे तभी अंडर-19 की भारतीय टीम में शामिल कर लिए गए। 2004 के अंडर-19 वल्र्ड कप में रैना ने तीन अर्धशतक लगाए जिसमें 38 गेंदों में बनाए 90 रन शामिल है।
बॉर्डर-गावसकर ट्रॉफी छात्रवृत्ति के लिए चयन : रैना का चयन बॉर्डर-गावसकर ट्रॉफी छात्रवृत्ति के लिए भी हुआ था। बीसीसीआई ने उन्हें छात्रवृत्ति के तहत ऑस्ट्रलिया विशेष प्रशिक्षण के लिए भेजा। वहां से वापस आने के बाद रैना ने उत्तर प्रदेश रणजी ट्रॉफी टीम के लिए एक ही सत्र में 6 मैचों में 620 रन बनाए। इतना ही नहीं रैना के शानदार प्रदर्शन के कारण उत्तर प्रदेश ने रणजी ट्रॉफी जीतने का श्रेय पाया।
पहला अंतर्राष्ट्रीय शतक (101 रन) 2008 में : रैना ने पहला अंतर्राष्ट्रीय शतक 23 जून 2008 को एशिया कप में हांगकांग के खिलाफ लगाया।इसके बाद के मैच में उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ 84 व बांग्लादेश के खिलाफ 116 नाबाद रन बनाए। तीनों ही अवसरों पर उन्हें मैन ऑफ द मैच का अवार्ड मिला। इस टूर्नामेंट से पहले एक अवसर ऐसा भी आया था जब खराब प्रदर्शन के कारण उन्हें साल भर तक टीम इंडिया से बाहर होना पड़ा था। बाद में घरु क्रिकेट में बढिय़ा खेल कर उन्होंने वापसी की।
तीसरा शतक डेढ़ साल बाद : रैना को वनडे का तीसरा शतक लगाने में डेढ़ साल का समय लग गया। तीसरा शतक उन्होंने ढाका में आयोजित ट्राई नेशंस स्पर्धा में श्रीलंका के खिलाफ (106 रन) 13 जनवरी 2010 में लगाया। दूसरे शतक व तीसरे शतक के बीच डेढ़ साल का अंतर रहा। इस बीच रैना तीस से ज्यादा वनडे खेले लेकिन सफलता नहीं मिली।
भविष्य है उज्जवल : रैना के बारे में महान कपिलदेव का कहना है कि उनका भविष्य उज्ज्वल है लेकिन उन्हें अभी से आसमां पर नहीं चढ़ाना चाहिए। कपिल उनमें भविष्य का कप्तान भी देखते हैं।
फील्डिंग है लाजवाब : रैना सीधे थ्रो से रनआउट करने में माहिर हैं। साथ ही वे एक चतुर फील्डर भी हैं। उनकी फुर्ती युवराज या मोहम्मद कैफ से कम नहीं है।
बल्लेबाजी की खूबी : रैना कवर ड्राइव लगाने में माहिर है लेकिन वे मिडविकेट क्षेत्र में गेंद को फ्लिक करने में भी उतने ही पारंगत हैं। उनका फुटवर्क काफी अच्छा है जिससे वे स्पिनरों की जमकर धुनाई करते हैं। तेज गेंदबाजों को भी आगे बढ़कर धुनाई करने में माहिर हैं। इसके अलावा रैना फाइन लेग पर स्कूप शॉट खेलने में भी माहिर हैं।
आवश्यकता है मानसिक दृढ़ता कायम रखने की: रैना को यदि लंबे समय तक अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में बने रहना है तो उन्हें सचिन व द्रविड़ जैसी एकाग्रता विकसित करनी होगी। यदि वे युवराज सिंह जैसी जीवनशैली अपनाएंगे तो कांबली या मोहम्मद कैफ बनने में उन्हें देर नहीं लगेगी। गनीमत है कि आईपीएल के दौरान चेन्नई सुपर किंज्स के कप्तान धोनी से काफी कुछ सीखने को मिला जो कि टीम इंडिया में उन्हें स्थाई जगह बनाने में लाभदाई साबित होगा।

वनडे मैचों में प्रदर्शन
मैच-पारी-कुल रन--सर्वश्रेष्ठ- कुल शतक -अर्धशतक

90-73-2214-116*-3-15
प्रथम श्रेणी के मैचों में प्रदर्शन
मैच-पारी-कुल रन--सर्वश्रेष्ठ- कुल शतक -अर्धशतक
51-86-3684-203-6-25
टी20 अंतर्राष्ट्रीय में प्रदर्शन
मैच-पारी-कुल रन--सर्वश्रेष्ठ- कुल शतक -अर्धशतक
13-12-268-101-1-1
आईपीएल में प्रदर्शन
मैच-पारी-कुल रन--सर्वश्रेष्ठ- कुल शतक -अर्धशतक
30-28-855-98-0-5

'जिन्न' को जाना ही होगा बोतल में

Publicado  मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

प्रशांत रायचौधरी
कुछ साल पहले भारतीय क्रिकेट के महाशक्तिशाली व्यक्तित्व जगमोहन डालमिया से निपटने के लिए वरिष्ठ क्रिकेट प्रशासक आईएस बिंद्रा ने बोतल से एक 'जिन्न' को बाहर निकाला था और उस जिन्न ने 'जो हुक्म मेरे आका' कह कर वह सबकुछ किया जो डालमिया को निपटाने के लिए आवश्यक समझा गया। उसने न केवल कूटनीति के जरिए बल्कि बीसीसीआई की बैठकों में अपमान की हद तक जाकर डालमिया को नेपथ्य में ढकेल दिया। जिन्न बोतल से निकल चुका था और वह इतना शातिर हो गया कि उसे बोतल में डालना मुश्किल सा हो गया है।

जिन्न ने बोतल में जाने के बदले आईपीएल के रूप में एक नया फॉर्मूला पेश किया जिसमें बेशुमार धन तो था ही साथ ही सूरा व सुंदरी के मजे ही मजे थे। फिर क्या था धन लोलुप बीसीसीआई ने इस फॉर्मूले को हकीकत का जामा पहना दिया। देखते ही देखते जिन्न और शक्तिशाली होता चला गया और उसके सामने बीसीसीआई के बड़े से बड़े पदाधिकारी बौने नजर आने लगे।

इस जिन्न को शक्तिशाली बनाने में पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष आईएस बिंद्रा का सबसे बड़ा हाथ था। बिंद्रा पहले से ही कहते रहे हैं कि क्रिकेट में सट्टा को मान्यता मिलनी चाहिए जैसा कि विदेशों में होता है। उनकी चाहत को केंद्र सरकार का सहयोग तो नहीं मिला लेकिन जिन्न समझ गया कि यदि मैं गैरकानूनी तरीके से सट्टेबाजी या मैच फिक्सिंग करूं तो मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। उनकी सोच थी कि हमाम में सभी नंगे हैं। उसने किया भी वही जो उन्हें अच्छा लगा।

ललित मोदी नामक यह जिन्न अब क्रिकेट के लिए हानिकारक होता जा रहा है। केंद्र सरकार और बीसीसीआई की कोशिश है कि जितनी जल्दी हो सके इस जिन्न को बोतल में वापस डाल दिया जाए। अब देखना है कि वे काबू में आ पाते हैं या नहीं। मैंने इसके पहले के लेख में लिखा था कि आईपीएल में मस्ती ही मस्ती है। उसमें मैच फिक्सिंग की भी चर्चा की थी।

आखिर जिन मुद्दों पर मैंने कटाक्ष किया था वह सही साबित हुआ। शशि थरूर-ललित मोदी प्रकरण के बाद आईपीएल जिस कदर बदनाम हुआ है उससे तो यही लगता है कि न केवल ललित मोदी को आईपीएल के कमिश्नर पद से हटा देना चाहिए बल्कि सट्टे का आकार ले रहे इस टूर्नामेंट को बंद कर देना चाहिए।

मोदी से इसलिए सभी हैं नाराज :

ललित मोदी अपने खराब व्यवहार, दंभी स्वभाव व झगड़ालू प्रवृत्ति के कारण कुख्यात हैं। चाहे राजस्थान क्रिकेट संगठन का मसला हो या बीसीसीआई से जुड़े मामलों का उन्होंने अपने दोस्त से ज्यादा दुश्मनों की संख्या बढाई है। यही कारण है कि अब जब आईपीएल पर इंकम टैक्स का छापा पड़ा और मोदी पर मैच फिक्सिंग व सट्टेबाजी में लिप्त होने के प्रमाण मिलने लगे तो लोग उनसे कन्नी काटने लगे हैं। मोदी ने टि्वटर पर शशि थरूर की पोल खोली थी लेकिन अब टि्वटर के कारण ही उनकी भी बिदाई संभव है। मोदी भले कहे कि उनका बाल बांका नहीं होगा लेकिन केंद्र सरकार उन्हें नहीं बख्शने वाली है।

अपार धन आया कहां से?

प्राप्त जानकारी के अनुसार ललित मोदी ने इंकम टैक्स भरने में भी काफी गफलत की है। उन्होंने 2007 में 19 लाख रुपए एडवांस टैक्स भरा। इसके बाद 2008 में 2.5 करोड रुपए टैक्स दिया। 2009 में यह रकम सिर्फ 32 लाख रही लेकिन, 2009-10 में यह बढ़कर 11 करोड रुपए हो गया। आखिर टैक्स भरने में विरोधाभास क्यों? एक साल पहले सिर्फ 32 लाख टैक्स भरने वाले मोदी की कमाई उसी साल 50 करोड़ रुपए तक कैसे पहुंच गई।

मोदी के पास है एरोप्लेन :

विमान, याट के अलावा मर्सिडीज व बीएमडब्ल्यू जैसी ढेरों कारें मोदी के पास है। जिस व्यक्ति ने चार साल पहले कोई टैक्स नहीं भरा था वह एकाएक अपार धन का मालिक कैसे बन गया। अगर सरकार मोदी के खिलाफ कोई कदम उठाने का मन बना चुकी है तो इसमे गलत क्या है।

अब क्या होगा मोदी के साथ :

इंकम टैक्स विभाग राजस्थान टीम की फंडिंग के स्रोत की जानकारी ले रही है। इस टीम में जयपुर आईपीएल प्रालि. की हिस्सेदारी है, जो मोदी के नजदीकी रिश्तेदार सुरेश चेलाराम की है। यह चौंकाने वाला तथ्य है कि गठन से पहले ही इस कंपनी को मॉरीशस से पैसा कैसे मिल गया। मॉरीशस के अलावा कई अन्य देशों से भी राजस्थान रॉयल्स को धन मिल चुका है। माना यह जा रहा है कि मोदी के कारण ही धन की बरसात हुई है

आईपीएल में बस मौजा ही मौजा

Publicado  रविवार, अप्रैल 11, 2010

प्रशांत रायचौधरी
दक्षिण अफ्रीका के प्रमुख बल्लेबाज हर्शेल गिब्स का कहना है कि वे आईपीएल में खेलने के प्रति गंभीर नहीं है। वे तो मैच के बाद होने वाली रंगीन पार्टियों,चीयर लीडर्स तथा बॉलीवुड अदाकाराओं के सानिध्य का आनंद लेने के लिए भारत आते हैं। इससे पहले भी गत वर्ष शाहिद आफरीदी ने कहा था कि जब सामने चियर लीडर्स हो तो रन कैसे बन सकते हैं। मेरा ध्यान तो उनकी अदाओं पर रहता है।

इसका मतलब यह हुआ ऐसे बहुत से खिलाड़ी होंगे जो आईपीएल से न केवल धन प्राप्त कर रहे हैं बल्कि सूरा व सुंदरियों पर धन भी लुटा भी रहे होंगे। इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत उन उभरते खिलाड़ियों को हो रही होगी जिनका अभी क्रिकेट में भविष्य बनना है। ये खिलाड़ी कैरियर बनने से पहले ही रात की रंगीनियों मजा लेने लगे हैं। ललित मोदी के तिलस्म में इनकी तरूणाई गुम हो गई है।

सट्टेबाजी जोरों पर : आईपीएल के चलते लोगों में सट्टेबाजी की प्रवृत्ति भी बढती जा रही है। आखिर बीसीसीआई समाज को किस ओर ले जाना चाहती है। सट्टेबाजी का आलम तो यह है कि पाकिस्तान में भी आईपीएल का प्रसारण सट्टेबाजों के दबाव में हो चुका है।सिर्फ भारत में ही रोजाना 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का सट्टा लगता है। विदेशों में भी ऑनलाइन सट्टा लगाया जा रहा है।

सट्टेबाजी के बारे में पिछले दिनों भोपाल की बड़ी झील के समीप पहाड़ी में स्थित एक होटल के वेटरों को बोलते सुना था कि उनका पूरा वेतन आईपीएल की सट्टेबाजी में चला गया। वे तब भी यह कह रहे थे कि हम सट्टा खेलना नहीं छोड़ेंगे। हमें क्रिकेट का नशा हो चुका है। यह तो एक उदाहरण है लेकिन सच्चाई यह है कि उच्च वर्ग से लेकर निम्न वर्ग तक लोग क्रिकेट के सट्टे में फंसते जा रहे हैं।

बीसीसीआई को कोई फिक्र नहीं : भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सट्टेबाजी की जरा भी फिक्र नहीं है। उलटे बीसीसीआई के आईएस बिंद्रा कई सालों से खुले आम कह रहे हैं कि क्रिकेट सट्टा को केंद्र शासन से मान्यता मिलनी चाहिए। जब विदेशों में विभिन्न खेलों पर सट्टा फल-फूल रहा है तो भारत में क्यों नहीं। बीसीसीआई को शायद स्वस्थ समाज की चिंता नहीं है इसलिए उसने आईपीएल के रूप में धीमा जहर परोस दिया है। आईपीएल सिर्फ खेल बन कर रह जाता तो ठीक है लेकिन इसमें ग्लैमर की सेंधमारी से अब सबकुछ स्वस्थ नहीं रह गया है।

क्या बंद हो आईपीएल : आईपीएल को बंद करने के बजाय उसका नियंत्रण पूरी तरह से बीसीसीआई के हाथ में आ जाना चाहिए। अभी इसमें आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी का फंडा हावी है लेकिन एक बार बीसीसीआई के कब्जे में आने के बाद सुधार की पूरी तरह से गुंजाईश है। कमसे कम रात की रंगीनियों पर तो नियंत्रण किया ही जा सकता है। हां, इसके लिए अरबपति फ्रेंचाइजियों का भी सहयोग अपेक्षित है।

फायदा भारतीय खिलाड़ियों को हुआ : आईपीएल के तीन संस्करण से कई भारतीय खिलाड़ी उभरे। उदाहरण के लिए यूसुफ पठान आईपीएल की ही देन है। उनके अलावा एम.बिसला, टी.सुमन, के.जाधव, मनीष पांडे, नमन ओझा, आर. विनय कुमार आदि को भी लोग आईपीएल के कारण ही जानने लगे हैं। यदि इस फटाफट के फॉर्मेट को खेल ही रहने दिया जाए और ग्लैमर को कट कर दिया जाए तो खेल का ही भला होगा अन्यथा एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब लोग आईपीएल से उबने लगेंगे। वैसे भी महिलाएं फिर से टीवी सीरियल देखने में व्यस्त हो गईं है और मैच के दौरान भी सड़कों में भीड़ उमड़ने लगी है।