प्रशांत रायचौधरी
ग्वालियर में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मास्टर ब्लास्टर सचिन के वनडे क्रिकेट इतिहास के पहले दोहरे शतक के बाद से विभिन्न पीढ़ी के बेहतरीन खिलाड़ियों के बीच तुलना करने का सिलसिला प्रारभ हो चुका है। ।महान डॉन ब्रैडमैन, जैक्स हॉब्स, गैरी सोबर्स, लेन हटन,सचिन तेंडुलकर, विवियन रिचर्ड्स, नील हार्वे, ब्रायन लारा, इयान चैपल और रिकी पोंटिंग ये दस खिलाड़ी हैं जिन्हें सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ टॉप-10 की संज्ञा दी जाती है।
मान लेते हैं कि डॉन ब्रैडमैन जिंदा हैं और वे पैड पहनकर बल्लेबाजी का अभ्यास करने जा रहे हैं। और वे सचिन को कहते हैं कि वे उनके खेल को देखे, तो उनके द्वारा लगाए गए स्ट्रोक्स के आधार पर उन्हें फौरन पहचान लिया जाता। सचिन की इन शॉट्स पर तुरंत ही यह प्रतिक्रिया होती कि ऐसे शॉट्स डॉन ही लगा सकते हैं और अगर सचिन बल्लेबाजी कर रहे होते, तो डॉन की प्रतिक्रिया होती कि ऐसा सचिन ही खेल सकते हैं।
जिस प्रकार ब्रैडमैन को अपने तरह से खेलने की शैली सचिन में दिखती थी, उसी तरह से सचिन को स्टेन मैकबे और वेस्टइंडीज के गैरी सोबर्स के खेलने की शैली महान दिखती है।
स्पष्ट है कि श्रेष्ठ की पहचान तुरंत और प्राय: सहज रूप मे हो जाती है। इस संबंध में संदेह करने की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं होती है। अब तक इस खेल के इतिहास में बहुत से प्रतिभाशाली खिलाड़ी हुए हैं, जोकि महानता के स्तर को छुने से थोड़ा सा पीछे रह गए। इनमें से कुछ खिलाड़ी आज यह महसूस करते हैं कि महानता बहुत से गुणों का एक सम्मिश्रण है, जो कुछ लोगों में तो जन्मजात होता है और दूसरे लोग इसे अपनी मेहनत से अर्जित करते हैं। 'प्रतिभा 99 प्रतिशत परिश्रम से और केवल एक प्रतिशत प्रेरणा से आती है'
अक्सर ड्राइंगरूम की बहसों में मनोरंजन के लिए इस बात पर विचार किया जाता है कि बॉडीलाइन क्षेत्ररक्षण में ब्रॉयन लारा किस प्रकार से हेराल्ड लारवुड की शॉर्ट-पिच गेंदों का सामना करते। शायद त्रिनिदाद का यह प्रतिभाशाली बल्लेबाज इन शॉर्र्ट-पिच गेंदों को हवा में उछलकर खेलते। पर इस सगााई से कोई मुंह नहीं मोड़ सकते कि इस प्रकार के प्रतिभाशाली खिलाड़ी तुरंत ही इन गेंदों के अनुरूप अपने को ढाल लेते और आराम से इन गेंदों पर शॉट्स लगाते।
इसी तरह से यह प्रश्न उठता है कि अपने समय के महान बल्लेबाज डेनिस कॉम्पटन किस प्रकार से शेन वार्न को खेलते? ऑस्ट्रेलिया के बाएं हाथ के बल्लेबाज नील हार्वे भारत के बेहतरीन स्पिन गेंदबाज सुभाष गुप्ते को खेलने में माहिर थे और इस संबंध में तमाम साक्ष्य भी हैं, पर क्या वह इतनी ही कुशलता से शेन वार्न को खेल पाते? यह उदाहरण है उन गेंदबाजों का जो कि कुछ बेहतरीन बल्लेबाजों को कभी गेंद नहीं कर सके। साथ ही यह उदाहरण उन श्रेष्ठ बगेबाजों के लिए भी है जोकि उन बेहतरीन गेंदबाजों का कभी सामना नहीं कर सके। किंतु यह कमी खेल की सौम्यता, जटिलता और दिलचस्पी को ही बढ़ाती है। इसका संदेह एकदम साफ है कि किसी भी महान खिलाड़ी की महानता उसकी ताकत के आधार पर आंकी जाती है। उसके रिकार्ड ही उसकी महानता की गवाही देते हैं और एक बार इन पर विश्वास जम जाने पर यह मापदंड ही उसके मूल्यांकन के काम में लाए जाते हैं।
टेस्ट क्रिकेट का सर्वश्रेष्ठ बगेबाज और गेंदबाज कौन है?
अगर आंकड़ों की भाषा में बात करें तो ब्रैडमैन के 99.94 के बगेबाजी औसत या इंगलैंड के सिडनी फ्रांसिस बर्न्स के 27 टेस्ट मैचों में 16.43 के औसत से 189 विकेट को शामिल करते ही यह बहस समाप्त हो जाती है। यह रिकार्ड अभी तक तोड़े नहीं जा सके हैं और संभव है कि यह लंबे समय तक बने रहें। अब तक के सर्वश्रेष्ठ दस बगेबाजों की सूची में सचिन की रैंकिंग तय करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, पर यह भी एक आनंददायक कवायद ही है।
बिना किसी प्रश्चिन्ह के ब्रैडमैन को इस टॉप टेन की सूची में नंबर एक पर रखकर दूसरे 9 खिलाड़ियों को चुनने की प्रक्रिया प्रारंभ करने में कवर्ड और अनकवर्ड पिचों(ढके ओर बिना ढके पिच) पर ध्यान देना जरूरी है। अनकवर्ड पिचों के दौर में कम क्रिकेट खेली जाती थी। जबकि आज कवर्ड पिचों के समय में पहले की तुलना में दस गुना या उससे भी अधिक क्रिकेट खेली जाती है। अनकवर्ड पिचों पर बल्लेबाजी के लिए अच्छी कुशलता और तकनीक की जरूरत होती है। जबकि एकदिनी क्रिकेट की प्रचुरता के कारण आज जिस क्रिकेट को हम देख रहे हैं उसके लिए चुस्ती-फुर्ती और फिटनेस की अधिक आवश्यकता है। अत: ऐसे में चुनाव तभी निष्पक्ष हो सकता है जब खिलाड़ियों का चयन दोनों युगों से किया जाए।
अनकवर्ड पिचों के समय के चुने हुए खिलाड़ी हैं :
ब्रेडमेन, जैक हॉब्स, लेन हटन, गैरी सोबर्स और नील हार्वे। इसी प्रकार से इस सूची में शामिल होने वाले वर्तमान समय के खिलाड़ी हैं- विवियन रिचर्ड्स, तेंदुलकर, लारा, पोंटिंग और ग्रेग चैपल। इस संबंध में किसी अंतिम सूची तक पहुंचना आसान नहीं है, कारण कि इस सूची से अभी भी बहुत से बेहतरीन बल्लेबाज बाहर हैं। इसे इंगित करना जरूरी है कि इस सूची में शामिल दस खिलाड़ियों में से केवल एक नील हार्वे का औसत ही पचास से कम है और इसका कारण भी अंतिम दस मैचों में उनकी खराब बगेबाजी रही है। हार्वे ने 1947-48 से 1962-63 के दौरान लगभग 79 टेस्ट मैच खेले। हार्वे के संबंध में ग्रेग चैपल का बयान आज भी मैं संजो के रखा हूं कि 'हार्वे मुझसे कहीं अधिक बेहतर खिलाड़ी था और ब्रेडमेन के बाद आस्ट्रेलिया में इससे बेहतर खिलाड़ी पैदा नहीं हुआ'।
महानता के लिए बेहतर खेल का मापदंड ही काफी
Publicado रविवार, फ़रवरी 28, 2010
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प्रशांत रायचौधरी
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रविवार, फ़रवरी 28, 2010
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विश्व खेल रत्न हैं मास्टर ब्लास्टर
Publicado शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2010
भले ही सचिन तेंडुलकर को अभी भी भारत रत्न अवार्ड नहीं मिला हो लेकिन खेलप्रेमियों की निगाह में वे विश्व खेल रत्न तो बन ही गए हैं। उन्हें वही सम्मान प्राप्त है जो रोजर फेडरर (टेनिस), यूसेन बोल्ट (धावक), माइकल शूमाकर (फॉमरूला-1 कार रेसर), क्रिश्टियानो रोनाल्डो (फुटबॉल) व माइकल फेल्प्स (तैराकी) को प्राप्त है। ग्वालियर के कैप्टन रूप सिंह स्टेडियम में 24 फरवरी को शाम के छह बजकर 14 मिनट में मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर ने वनडे क्रिकेट का विश्व का पहला दोहरा शतक बनाने के बाद आसमान की ओर देख कर भगवान व अपने स्वर्गीय पिता को तो याद किया ही लेकिन शायद उनके जेहन में कहीं न कहीं सईद अनवर भी रहे होंगे।
अनवर ने सचिन के नेतृत्व में खेल रही भारतीय टीम के खिलाफ 13 साल पहले 194 रन बना कर विश्व कीर्तिमान रचा था। तब से उनके मन में एक बोझ था कि उनके नेतृत्व में विश्व कीर्तिमान बन गया और उनकी रणनीति फेल हो गई। अब उन्हें इस बात से भी बेहद खुशी मिली होगी कि अनवर ने सचिन द्वारा उनके रिकॉर्ड तोड़े जाने पर कहा कि मेरी भी इच्छा थी कि कभी यदि रिकॉर्ड टूटे तो सचिन ही तोड़े।
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ ग्वालियर वनडे मैच में उन्होंने कवर ड्राइव,करारे हुक्स, पुल शॉट, लेट कट्स व कलाई के सहारे आकर्षक फ्लिक्स का जो शानदार प्रदर्शन किया उसे भूलाना मुश्किल है। उन्होंने पहले 100 रन 90 गेंदों में और बाद के 100 रन सिर्फ 47 गेंदों में पूरे किए। सचिन की इस बेमिसाल पारी के बाद उन्हें डॉन ब्रेडमैन, ब्रायन लारा व रिकी पोंटिंग से श्रेष्ठ होने की उपमा दी जा रही है जबकि सचिन ने मासूमियत से कहा कि रिकॉर्ड बनते ही टूटने के लिए है। मैं चाहता हूं कि मेरा रिकॉर्ड कोई भारतीय ही तोड़े।
सचिन के इस कथन से साबित होता है कि उनमें कोई अहंकार नहीं है और वे जमीन से जुड़े हुए हैं। महान लिटिल मास्टर सुनील गावसकर ने तो यहां तक कह दिया कि अब सचिन को टेस्ट में 450 रन व वनडे में 250 रन बनाने के बारे में सोचना चाहिए। गावसकर ने एक बात बिल्कुल सही कही है कि सचिन अभी भी क्रिकेट के बच्चे से लगते हैं जिसमें रनों की जबर्दस्त भूख है। सचिन रन के लिए ऐसे मचलते हैं कि लगता है कि वे अंत तक नाबाद रहेगे। ग्वालियर वनडे में वे ओपन करने आए और अंत तक नाबाद रहे।
फील्डिंग भी की : सचिन ने दोहरा शतक बनाने के बाद जब फील्डिंग का मौका आया तो बिना थके अंत तक फील्डिंग करते रहे। उन्होंने इससे पहले जयपुर वनडे में भी आखिरी गेंद पर चौका बचाया था जिससे भारत एक रन से रोमांचक जीत दर्ज कर सका था। दूसरी ओर सईद अनवर ने जब 194 रन की पारी खेली थी तब उन्होंने शाहिद आफरीदी का रनर के रूप में उपयोग किया था। सचिन भले ही फिट हों लेकिन उन्होंने कहा है कि वे अब फिटनेस पर और ज्यादा ध्यान देंगे।इसका मतलब है कि उनके बल्ले से कीर्तिमानों की बारिश जारी रहेगी।
अब शतकों के शतक की चर्चा: सचिन के नए कीर्तिमान के बाद अब चर्चा होने लगी है कि क्या वे इसी साल शतकों का शतक पूरा करने में कामयाब होंगे। फिलहाल उन्होंने टेस्ट में 47 व वनडे में 46 शतक लगाए हैं। वे मंजिल से 7 शतक दूर हैं। सचिन ने इस साल अभी तक चार शतक व एक दोहरा शतक लगाए हैं जबकि अभी इस साल का दूसरा माह भी खत्म नहीं हुआ है।
अनवर से है बेहतर पारी : अनवर व सचिन ने 1989 से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में प्रवेश किया। सईद अनवर ने अपने कैरियर के आठवें साल में 194 रन का कीर्तिमान रचा था जबकि सचिन को इस कीर्तिमान के लिए बीस साल तक इंतजार करना पड़ा। अनवर ने 29 साल की उम्र में व सचिन ने लगभग 37 साल की उम्र में व्यक्तिगत वनडे रन का विश्व कीर्तिमान रचा। अनवर ने जब भारत के खिलाफ 194 रन की पारी खेली थी तब लगा था कि इससे बेहतर पारी हो ही नहीं सकती लेकिन सचिन ने ग्वालियर में जिस अंदाज में बल्लेबाजी की वह अनवर से बेहतर इस मायने में भी थी कि उन्होंने ढलती उम्र में करिश्मा किया। ऐसा लग रहा था कि गेंद पतंग की तरह उड़ रही हो।
अब आगे क्या : जहां तक सचिन का सवाल है तो अब उनका सपना शतकों के शतक के अलावा भारत को विश्व कप विजेता बनाने की है। जाहिर सी बात है कि सचिन इसके लिए अपने प्रदर्शन में और निखार लाएंगे और इसका लाभ टीम इंडिया को मिलेगा। सचिन से प्रेरित होकर टीम के अन्य साथी भी नए-नए कीर्तिमान रचने की कोशिश करेंगे और शायद तभी सचिन का कहा सही साबित होगा कि किसी भारतीय ने ही उनका रिकॉर्ड तोड़ा है।
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प्रशांत रायचौधरी
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शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2010
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इडियट कहने का करारा जवाब दिया भज्जी ने
Publicado शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010
गनिमत है कि ये खिलाड़ी मीडिया का बहिष्कार नहीं कर रहे हैं। हरभजन को इस बात का भी अफसोस है कि भारत के लिए कई टेस्ट सीरीज जीतने वाले कप्तान एमएस धोनी को भी इडियट कहा गया। हरभजन ने द.अफ्रीका के खिलाफ कोलकाता टेस्ट में ८ विकेट लेकर आलोचकों को करारा जवाब दे दिया है। भज्जी के लिए कहा जा रहा था वे गेंद को हवा मैउचल नहीं देते हैं, सिर्फ रन रोकने के कोशिश में रहते हैं लेकिन कोलकात्ता में यह धरना गलत साबित हुई।
भज्जी के अलावा कप्तान धोनी ने अपनी दमदार बल्लेबाजी व कुशल कप्तानी से सबका दिल जीत लिया है। देखा जाए तो भारत की यह जीत उसकी कुशल रणनीति व जीत की ललक के कारण संभव हो सकी है। नागपुर टेस्ट में करारी हार से कहा जा रहा था कि टीम में जीत की चाहत की कमी है जबकि भारतीय सितारे बांग्लादेश फतह कर लौटे ही थे।
गेंदबाजी फिर भी कमजोर : वैसे देखा जाए तो टीम इंडिया की गेंदबाजी कमजोर ही है। हमने भले ही कोलकाता में द।अफ्रीका के विकेट चटकाए हों लेकिन तेज गेंदबाजी में कमजोरी बरकरार है। तेज गेंदबाजों की नई फौज तैयार यदि नहीं कर सके तो भविष्य में दिक्कतें आएंगी। जहीर तीस साल से ज्यादा के हैं व उनकी जगह लेने वाला कोई गेंदबाज नजर नहीं आ रहा है। जहीर के साथ चोट लगने की समस्या बनी रहती है। अपने कैरियर में ५-६ बार वे चोट के शिकार हो चुके हैं। विदेशी धरती पर जब खेलना होगा तो टीम में कोई भी तेज गेंदबाज नहीं है जिससे विरोधी टीम खौफ खाए।
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प्रशांत रायचौधरी
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शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010
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मन भटका हुआ है इशांत शर्मा का
Publicado बुधवार, फ़रवरी 17, 2010
प्रशांत रायचौधरी
२२ टेस्ट मैचों में ६३ विकेट व ४१ टेस्ट मैचों में ५६ विकेट लेने के बाद भी दिल्ली के २१ साल के तेज गेंदबाज पर से यदि चयनकर्ताओं का भरोसा टूटता जा रहा है तो इसके लिए इशांत ज्यादा दोषी है। ऐसा लगता है की उनका खेल पर से ध्यान हट गया है। इशांत के बारे में जवागल श्रीनाथ और वेंकटेश प्रसाद जैसे दिग्गाज्जों का कहना है कि उनमे गजब कि प्रतिभा है और वे लम्बी रस के घोड़े हैंके प्रति सकारात्मक सोच के बाद भी यह चकित करने के लिए काफी है कि उनके प्रदर्शन में कमी दिखने लगी है ।
क्या कमी है इशांत में : वैसे देखा जाए तो इशांत में वह सभी खूबी है जो एक तेज गेंदबाज में होनी चाहिए। वे गेंद को दोनों छोर से सि्वंग कराने में माहिर हैं। इयान चैपल ने उन्हें मैक्ग्राथ व सौरव गांगुली ने कपिलदेव जैसी प्रतिभा के रूप में तारीफ की है। इशांत का तो इससे मनोबल बढ़ना चाहिए था उसके बजाय उनके खेल में गिरावट आती जा रही है। हालत यह है कि उन्हें द.अफ्रीका के खिलाफ वनडे टीम से बाहर होना पड़ा है। मेरे ख्याल से उनमें निम्न खामियां है- १. उन्होंने रनअप कम कर दिया है २. गेंद की गति भी पहले से धीमी कर दी है। ३. पहले के समान बाउंसर का उपयोग नहीं कर रहे हैं।
पहले सीरीज में छाए थे : वे आस्ट्रेलिया दौरे में छा गए थे। अपने पहले ही सीरीज में छह फुट ४ ईंच लंबे इशांत ने अपने हाई एक्शन गेंदबाजी से कंगारू धरती पर दिल जीत लिया था। इशांत ने अपने पहले २० वनडे मैच में ३१।४८ के एवरेज से २७ विकेट लिए।
धन ने बिगाड़ा मन : लगता है कि खेल से कम समय में ही मिले अपार धन से मन बिगड़ चुका है। वे मेहनत से जी चुराने लगे हैं। वे यदि वापसी के लिए मेहनत नहीं करेंगे तो अभिमन्यु मिथुन, सुदीप त्यागी व कई अन्य उनकी जगह लेने के लिए तैयार बैठे हैं। वैसे भी एस।श्रीसंथ, अशोक डिंडा, आरपी आदि उन्हें वनडे से बाहर रखने के लिए काफी हैं।
५ विकेट १ बार लिए : इशांत अपने कैरियर में ५ विकेट सिफर् १ बार ले सके हैं। उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलुरु टेस्ट में यह करिश्मा किया था।
२१ बार नहीं मिले विकेट : इशांत को टेस्ट में ११ बार व वनडे में १० बार एक भी विकेट नहीं मिला। इससे साबित होता है कि उन्हें अभी कितनी मेहनत करने की आवश्यकता है।
प्रस्तुतकर्ता
प्रशांत रायचौधरी
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बुधवार, फ़रवरी 17, 2010
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