प्रशांत रायचौधरी
दक्षिण अफ्रीका के प्रमुख बल्लेबाज हर्शेल गिब्स का कहना है कि वे आईपीएल में खेलने के प्रति गंभीर नहीं है। वे तो मैच के बाद होने वाली रंगीन पार्टियों,चीयर लीडर्स तथा बॉलीवुड अदाकाराओं के सानिध्य का आनंद लेने के लिए भारत आते हैं। इससे पहले भी गत वर्ष शाहिद आफरीदी ने कहा था कि जब सामने चियर लीडर्स हो तो रन कैसे बन सकते हैं। मेरा ध्यान तो उनकी अदाओं पर रहता है।
इसका मतलब यह हुआ ऐसे बहुत से खिलाड़ी होंगे जो आईपीएल से न केवल धन प्राप्त कर रहे हैं बल्कि सूरा व सुंदरियों पर धन भी लुटा भी रहे होंगे। इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत उन उभरते खिलाड़ियों को हो रही होगी जिनका अभी क्रिकेट में भविष्य बनना है। ये खिलाड़ी कैरियर बनने से पहले ही रात की रंगीनियों मजा लेने लगे हैं। ललित मोदी के तिलस्म में इनकी तरूणाई गुम हो गई है।
सट्टेबाजी जोरों पर : आईपीएल के चलते लोगों में सट्टेबाजी की प्रवृत्ति भी बढती जा रही है। आखिर बीसीसीआई समाज को किस ओर ले जाना चाहती है। सट्टेबाजी का आलम तो यह है कि पाकिस्तान में भी आईपीएल का प्रसारण सट्टेबाजों के दबाव में हो चुका है।सिर्फ भारत में ही रोजाना 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का सट्टा लगता है। विदेशों में भी ऑनलाइन सट्टा लगाया जा रहा है।
सट्टेबाजी के बारे में पिछले दिनों भोपाल की बड़ी झील के समीप पहाड़ी में स्थित एक होटल के वेटरों को बोलते सुना था कि उनका पूरा वेतन आईपीएल की सट्टेबाजी में चला गया। वे तब भी यह कह रहे थे कि हम सट्टा खेलना नहीं छोड़ेंगे। हमें क्रिकेट का नशा हो चुका है। यह तो एक उदाहरण है लेकिन सच्चाई यह है कि उच्च वर्ग से लेकर निम्न वर्ग तक लोग क्रिकेट के सट्टे में फंसते जा रहे हैं।
बीसीसीआई को कोई फिक्र नहीं : भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सट्टेबाजी की जरा भी फिक्र नहीं है। उलटे बीसीसीआई के आईएस बिंद्रा कई सालों से खुले आम कह रहे हैं कि क्रिकेट सट्टा को केंद्र शासन से मान्यता मिलनी चाहिए। जब विदेशों में विभिन्न खेलों पर सट्टा फल-फूल रहा है तो भारत में क्यों नहीं। बीसीसीआई को शायद स्वस्थ समाज की चिंता नहीं है इसलिए उसने आईपीएल के रूप में धीमा जहर परोस दिया है। आईपीएल सिर्फ खेल बन कर रह जाता तो ठीक है लेकिन इसमें ग्लैमर की सेंधमारी से अब सबकुछ स्वस्थ नहीं रह गया है।
क्या बंद हो आईपीएल : आईपीएल को बंद करने के बजाय उसका नियंत्रण पूरी तरह से बीसीसीआई के हाथ में आ जाना चाहिए। अभी इसमें आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी का फंडा हावी है लेकिन एक बार बीसीसीआई के कब्जे में आने के बाद सुधार की पूरी तरह से गुंजाईश है। कमसे कम रात की रंगीनियों पर तो नियंत्रण किया ही जा सकता है। हां, इसके लिए अरबपति फ्रेंचाइजियों का भी सहयोग अपेक्षित है।
फायदा भारतीय खिलाड़ियों को हुआ : आईपीएल के तीन संस्करण से कई भारतीय खिलाड़ी उभरे। उदाहरण के लिए यूसुफ पठान आईपीएल की ही देन है। उनके अलावा एम.बिसला, टी.सुमन, के.जाधव, मनीष पांडे, नमन ओझा, आर. विनय कुमार आदि को भी लोग आईपीएल के कारण ही जानने लगे हैं। यदि इस फटाफट के फॉर्मेट को खेल ही रहने दिया जाए और ग्लैमर को कट कर दिया जाए तो खेल का ही भला होगा अन्यथा एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब लोग आईपीएल से उबने लगेंगे। वैसे भी महिलाएं फिर से टीवी सीरियल देखने में व्यस्त हो गईं है और मैच के दौरान भी सड़कों में भीड़ उमड़ने लगी है।
आईपीएल में बस मौजा ही मौजा
Publicado रविवार, अप्रैल 11, 2010
प्रस्तुतकर्ता
प्रशांत रायचौधरी
पर
रविवार, अप्रैल 11, 2010
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1 टिप्पणियाँ:
आपको यहां पढ़कर अच्छा लगा प्रशांत जी।
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